कंपनी – कंपनी का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएँ , कंपनी के गुण एवं दोष

कंपनी : कंपनी का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएँ , कंपनी के गुण एवं दोष –  दोस्तो आपने कंपनी के बारे में तो सुना ही होगा और आप इसके बारे में भली भांति जानते ही होंगे और इसी के साथ आज बहुत ही ज्यादा बढ़ी बढ़ी कंपनी का विकाश होता जा रहा है। 

दोस्तो आने वाले समय में दुनिया में कंपनियां अपना एक बड़ा रूप बना लेगी और हो सकता है ज्यादा से ज्यादा लोगो को रोजगार मिल सके  तो दोस्तो आज हम किसी कंपनी के गुण और दोष के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे और आपको इनके बारे में विस्तार से आपको समझाने की कोशिश करेंगे । कंपनी : कंपनी का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएँ , कंपनी के गुण एवं दोष 

कंपनी : कंपनी का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएँ , कंपनी के गुण एवं दोष
कंपनी : कंपनी का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएँ , कंपनी के गुण एवं दोष

विषय सूची

कंपनी का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, विशेषताएँ , कंपनी के गुण एवं दोष

कंपनी का अर्थ

 कंपनी शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द कम्पैनिस से हुई हैं। लैटिन भाषा में कम शब्द का अर्थ हैं साथ-साथ से है और पेनिस शब्द का अर्थ हैं ‘रोटी’’। प्रारंभ में कंपनी से आशय ऐसे व्यक्तियों के समूह से था, जो साथ साथ भोजन के लिये इकट्ठा होते थे, इसी का बिगड़ा रूप ‘कंपनी’ हैं। 

दोस्तो साधारण अर्थ मे उत्तरदायित्वों कंपनी से यह है की आशय व्यक्तियों के एक ऐसे ऐच्छिक संघ से है उत्तरदायित्वों जो किसी भी सामान्य उद्देश्य की प्राप्ति के लिये ही स्थापित किया जाता हैं। एकांकी व्यापार

कंपनी की परिभाषा

कुछ विद्वानों द्वारा दी गयी परिभाषायें है- कंपनी का अर्थ

  1. दोस्तो आपको बता दे की कम्पनी अधिनियम 1956 को धारा 3 (1 और 2) के अनुसार- कम्पनी क आशय एक ऐसी कम्पनी से है जिसका निर्माण एवं पंजीकरण इसी अधिनियम के अन्तर्गत ही हुआ हो।
  2. एक न्यायाधीश जेम्स के अनुसार-‘एक कंपनी जो की अनेक व्यक्तियों का एक समूह हैं जिसका संगठन किसी भी एक विशिष्ट उद्देश्य के ही लिये किया जाता हैं।’’
  1. अमेरिकन प्रमुख न्यायाधीश मार्शल के अनुसार- ‘‘संयुक्त पूंजी कंपनी एक कृत्रिम अमूर्त व अदृश्य संस्था हैं जिसका अस्तित्व वैधानिक होता है, क्योंकि वह वैधानिक रूप से निर्मित होती हैं।’’
  2. प्रा. एल. एच. हैने के अनुसार- ‘‘संयुक्त कंपनी पूंजी लाभ के लिये बनायी गई व्यक्तियों का ऐच्छिक संघ है। जिसकी पूंजी हस्तांतरणीय अंशों में विभक्त होती हैं एवं इसके स्वामित्व के लिये सदस्यता की आवश्यकता होती है।’’
  3. जस्टिस जेम्स के अनुसारः- ‘‘कोई भीएक कम्पनी बहुत सारे व्यक्तियों का एक समूह है, जिसका संगठन किसी एक प्रमुख विशेष उद्देश्य के लिए ही किया जाता है’’
  1. भारतीय कंपनी अधिनियम के अनुसार,1956 के अनुसार- ‘‘एक सरकारी कंपनी का अर्थ इस अधिनियम के अंतर्गत निर्मित तथा पंजीकृत कंपनी से हैं या  इसमें कोई भी विद्यमान कंपनी से हैं जिसका पंजीयन भारतीय कंपनी अधिनियम,1882, 1886, 1913 के अधीन हुआ हो।’’

कंपनी के गुण

कंपनी के गुण या लाभ निम्न प्रकार है…

  1. सीमित दायित्व 

दोस्तो यह इसकी विशेषता भी है और एक प्रकार का गुण भी है। गुण इसलिए है कि इसके कारण सदस्यों या अंशधारियों का व्यक्तिगत जोखिम अंशो मे निवेशित राशि तक ही रहता है। 

  1. अंशो की हस्तान्तरणीयता

अंशधारियों को उनके द्वारा धारित अंशों को बेचने का अधिकार भी होता है। इस प्रकार खरीदने वाला व्यक्ति उनके स्थान पर कंपनी का सदस्य भी बन जाता है।

  1. निरन्तरता की क्षमता 

अंशो की हस्तान्तरणीयता के कारण अंशो का क्रय-विक्रय भी आसानी से होता है। सदस्यों का आना-जाना भी लगा रहता है,  किन्तु इस सबसे कंपनी की निरन्तरता पर कोई आँच ही नही आती है।

  1. विकास की क्षमता 

दोस्तो विपुल वित्तीय एवं प्रबन्धकीय संसाधनों के आधार पर अपनी कंपनी विकास एवं विस्तार की अच्छी क्षमता भी रखती है।

  1. सुदृढ़ वित्तीय शक्ति 

अंशधारी एक भारी संख्या मे कंपनी के अंशो मे निवेश करते है। अतः कंपनी के पास वित्तीय साधनों का पर्याप्त भण्डार भी बना रहता है। आवश्यकता होने पर वह अतिरिक्त अंशों का निर्गमन करके एवं ऋण लेकर भी वित्तीय-स्थिति मे सुधार भी कर सकती है।

  1. ॠण प्राप्त करने की क्षमता 

कंपनी के पास अपनी स्वयं की पर्याप्त स्वामिपूंजी भी होती है जिनके बल पर वह अनेक प्रकार की परिसम्पत्तियों के ढ़ांचे का निर्माण भी करती है। इनकी जमानत पर उसे ॠण प्राप्त करने मे कोई भी कठिनाई नही होती है। बन्धकपत्रों एवं बाण्डों का निर्गमन करके वह एक ऋणपूंजी  प्राप्त कर लेती है, क्योंकि वित्तीय संस्थाओं का अच्छा विश्वास उसे प्राप्त हो जाता है। इनके अतिरिक्त दीर्घकालीन ऋण भी इसे बहुत सरलता से प्राप्त हो जाता है।

  1. केन्द्रीकृत प्रबंध

आवश्यक नीति संबंधी मामलों पर शीघ्र निर्णयन के लिये समय-समय पर निदेशक मण्डल की मीटिंग दिन प्रतिदिन होती रहती है। पूर्वानुमान, आयोजन, नियंत्रण एवं समन्वय आदि के लिये नीति संबंधी निर्णय संबंध के उच्च स्तर पर ही किये जाते है। मध्य एवं निचले स्तरों पर पेशेवर प्रबंधकों द्वारा उनका परिचालन भी किया जाता है।

  1. बाजार पर मजबूत पकड़ 

अपनी साख एवं सुदृढ विक्रय व्यवस्था के आधार पर प्रायः कंपनियाँ विस्तृत बाजार पर अपनी खुद की पकड़ बना लेती है। 

  1. सस्ते एवं गुणवत्ता वाले उत्पाद 

अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी तथा विशाल स्तर पर, उत्पादन के आधार पर प्रायः कंपनियां उपभोक्ताओं को सस्ते एवं गुणवत्ता वाले उत्पाद उपलब्ध कराने मे ज्यादा सफल रहती है। 

 

कंपनी के दोष या सीमाएं – कंपनी के दोष

-कंपनी के दोष या सीमायें इस प्रकार है– 

  1. निर्माण कठिन 

दोस्तो कंपनी का निर्माण सरलता से नही होता। कंपनी की स्थापना एवं समापन मे अनेक वैधानिक औपचारिकताओं का सामना भी करना पड़ता है। समय एवं धन को भी जुटाना भी कठिन होता है। अतः छोटे पैमाने के उद्योग हेतु यह आवश्यक नही है।

 

  1. अनुत्तरदायी प्रबंध व्यवस्था 

दोस्तो किसी कंपनी संगठन के अंशधारियों की संख्या बहुत अधिक होने के अतिरिक्त वे दूर-दूर तक के क्षेत्रों मे रहते है, बस इसलिए कंपनी का प्रबंध व संचालन अंशधारियों द्वारा न किया जाकर, परंतु वेतनभोगी संचालकों द्वारा किया जाता है। इन संचालकों एवं अन्य पेशेवर प्रबंधकों को तो निश्चित वेतन एवं सुविधायें मिलती रहती है, कंपनी के लाभों एवं हानियों का उन पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नही पड़ता है, अतः वे रूचिपूर्वक, निष्ठा तथा लगन से कार्य नही करते है। 

 

  1. अंशो मे सट्टेबाजी 

देखिए दोस्तो साधारणतया कंपनी के अंशो के स्वतंत्र हस्तान्तरण पर प्रतिबंध कभी नही होता है। अतः कोई भी व्यक्ति किसी स्कन्ध विनिमय केंद्र से अंशो का क्रय-विक्रय भी आसानी से कर सकता है। इन केन्द्रों पर सटोरिये जो अफवाहें फैलाकर अंशो मे मूल्यों मे वृद्धि अथवा कमी कराने मे भी सफल हो जाते है

तथा सट्टे द्वारा लाभ भी कमाते है। दूसरी ओर कंपनी के अंशो का मूल्य पिछले वर्ष की लाभांश दर से भी ज्यादा घटता-बढ़ता रहता है। फलस्वरूप अंशो के क्रय-विक्रय मे सट्टेबाजी को अधिक प्रोत्साहन मिलता है। इस कारण सामान्य विनियोजकों को अनावश्यक रूप से हानि भी उठानी पड़ती है।

 

  1. एकाधिकार का भय

दोस्तो आज अनेक अवसरों पर केवल एक ही प्रकार का व्यवसाय करने वाली कंपनियां आपस मे मिलकर संयोजन स्थापित भी कर लेती है। इस कारण उनके मध्य प्रतिस्पर्धा भी समाप्त हो जाती है तथा एकाधिकार की स्थिति भी पनपने लगती है, जिससे उपभोक्ताओं का बहुत शोषण होने लगता है।

 

  1. अंशधारियों का शोषण 

चूंकि दोस्तो कंपनी के समस्त अंशधारी प्रत्यक्ष रूप से कंपनी के संचालन एवं प्रबंध मे भाग भी नही लेते अतः कुछ चुने हुए सदस्य ही संचालक के रूप मे ही कार्य करते है। व्यक्ति कंपनी मे अपनी मनमानी नीतियां लागू करके कंपनी के अंशधारियों का शोषण भी करते है। एक ओर कंपनी के संचालक बड़े-बड़े वेतन एवं सुविधायें भी  प्राप्त करते है दूसरी तरफ अंशधारियों को बहुत ही कम लाभांश  वितरित करते है।

 

  1. केन्द्रीय संचालन एवं प्रबंध 

प्रजातंत्रीय प्रबंध व्यवस्था के नाम पर कंपनी संचालन तथा प्रबंध का कार्य केवल कुछ गिने-चुने व्यक्तियों के हाथों मे ही केन्द्रित रहता है। चूंकि ये व्यक्ति उच्च पदों पर पदासीन होते है, अतः इनके हितों की रक्षा भी नही हो सकती।

 

  1. प्रवर्तकों द्वारा कपट

किसी कंपनी के निर्माण संबंधी समस्त कार्य प्रवर्तकों द्वारा ही किया जाता है। हालांकि प्रवर्तकों को कंपनी के निर्माण मे अनेक प्रकार की कठिनाईयों का सामना भी करना पड़ता है, लेकिन वे कभी धोखाधड़ी भी करते है। कंपनी का पंजीयन हो जाने पर ये कंपनी के महत्वपूर्ण पदों को हथिया कर छल-कपट द्वारा अपने निजी स्वार्थों के लिए कंपनी का शोषण भी बहुत करते है।

 

  1. बड़े पैमाने पर उत्पादन की बुराइयाँ 

दोस्तो कंपनी संगठन बड़े पैमाने पर किया जाने वाला व्यवसाय है। इसके फलस्वरूप प्रबंध मे शिथिलता, साधनों का दुरूपयोग, समन्वय की समस्या आदि बुराइयां जन्म भी ले लेती है।

 

निष्कर्ष :-

दोस्तो आज हमने कम्पनी के गुण और दोष अथवा लाभ और हानि के बारे में आपको विस्तार से चर्चा की ओर आपको पूरी तरह समझाने की कोशिश की है और दोस्तो हमे उम्मीद है की अब आपको ये सब बाते अच्छी तरह समझ आ गई होगी ।दोस्तो आपको बता दे की किसी भी कंपनी को प्रारंभ करने से पहले उसके बारे में अच्छी तरह से अध्ययन कर ले और काफी सोच समझकर ही निर्णय ले ।अगर दोस्तो हमारे द्वारा दी गई ये जानकारी आपको अच्छी लगी हो तो इसे अपने दोस्तो में ज्यादा से ज्यादा शेयर करे ।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल – FAQ 

 

Q.1 कंपनी के गुण क्या हैं?

किसी भी एक कंपनी के लाभों में शामिल हैं कि: शेयरधारकों के लिए देयता भी सीमित है । किसी भी अन्य पार्टी को अपने शेयर बेचकर स्वामित्व स्थानांतरित करना भी आसान है। शेयरधारकों (अक्सर परिवार के सदस्यों) को कंपनी द्वारा नियोजित भी किया जा सकता है।

Q.2कंपनी की मुख्य विशेषता क्या है?

किसी भी एक निगम की  मुख्य पांच विशेषताएं सीमित देयता , शेयरधारक स्वामित्व, दोहरा कराधान, निरंतर जीवन काल और, ज्यादातर मामलों में, पेशेवर प्रबंधन हैं।

Q.3 कंपनी के फायदे और नुकसान क्या है?

किसी भी निगम के लाभों में व्यक्तिगत देयता संरक्षण, व्यावसायिक सुरक्षा और निरंतरता, और पूंजी तक आसान पहुंच आदि शामिल है। किसी भी एक निगम के नुकसान में समय लेने वाली और दोहरे कराधान के अधीन होने के साथ-साथ कठोर औपचारिकताओं और प्रोटोकॉल का भी पालन करना आदि शामिल है।

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